नेत्रदान – अमूल्य उपहार
क्या आप जानते हैं कि नेत्रदान से किसी नेत्रहीन व्यक्ति को जीवन में रौशनी वापस मिल सकती है?
नेत्रदान ऐसा महान कार्य है, जिससे हम अपनी मृत्यु के बाद भी दो लोगों की दुनिया रोशन कर सकते हैं।
नेत्रदान क्यों ज़रूरी है?
भारत में लाखों लोग ऐसे हैं जो कॉर्निया (आँख की वह पारदर्शी झिल्ली जिससे रोशनी अंदर जाती है) की खराबी की वजह से देख नहीं पाते।
इन रोगियों की दृष्टि सिर्फ नेत्र प्रत्यारोपण (Corneal Transplant) से ही लौट सकती है।
लेकिन समस्या यह है कि डोनर की कमी के कारण हर साल बहुत कम मरीजों का ही ऑपरेशन हो पाता है।
यही कारण है कि समाज के हर व्यक्ति को नेत्रदान के महत्व को समझना चाहिए।
नेत्रदान कब और कैसे किया जा सकता है?
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद 6–8 घंटे के अंदर नेत्रदान किया जा सकता है।
सिर्फ कॉर्निया (आँख की आगे की परत) लिया जाता है, पूरी आँख नहीं निकाली जाती।
नेत्रदान से मृतक की देह की सुंदरता या चेहरे की पहचान पर कोई असर नहीं पड़ता।
नेत्रदान के लिए मृतक का परिवार “आँख बैंक (Eye Bank)” से संपर्क करता है।
कौन नेत्रदान कर सकता है?
लगभग हर व्यक्ति नेत्रदान कर सकता है, चाहे उसने चश्मा लगाया हो, मोतियाबिंद हुआ हो या उम्र अधिक हो।
कुछ गंभीर संक्रामक बीमारियों जैसे HIV, हेपेटाइटिस आदि में नेत्रदान नहीं किया जा सकता।
नेत्रदान से होने वाले लाभ
एक व्यक्ति के नेत्रदान से दो लोगों की आँखों की रौशनी लौटाई जा सकती है।
समाज में उम्मीद और सकारात्मकता फैलती है।
यह दान सबसे बड़ा मानवीय योगदान है क्योंकि यह किसी की जिंदगी बदल देता है।
नेत्रदान की प्रक्रिया
यदि आप नेत्रदान करना चाहते हैं तो पास के आँख बैंक (Eye Bank) या किसी नेत्र अस्पताल से संपर्क कर के रजिस्ट्रेशन करें।
मृत्यु के बाद परिजन 24 घंटे चालू Eye Bank हेल्पलाइन नंबर पर फोन करके सूचना दें।
प्रशिक्षित डॉक्टर या टीम आपके घर/अस्पताल आकर आँख निकालेंगे।
यह प्रक्रिया 15–20 मिनट में पूरी होती है और बिलकुल सुरक्षित होती है।
नेत्रदान से जुड़ी आम भ्रांतियाँ और सच
| मिथक | सच्चाई |
|---|---|
| मृतक का चेहरा बिगड़ जाता है | सिर्फ कॉर्निया ली जाती है, चेहरे पर कोई असर नहीं पड़ता। |
| आत्मा को कष्ट होता है | नेत्रदान सेवा का कार्य है, हर धर्म इसे पुण्य समझता है। |
| उम्र, चश्मा, मोतियाबिंद में नेत्रदान नहीं हो सकता | अधिकांश लोग नेत्रदान कर सकते हैं; उम्र, चश्मा बाधा नहीं। |
| नेत्रदान से कानूनी समस्या हो सकती है | यह पूरी तरह वैध है, सरकार व अस्पताल भी इसे प्रोत्साहित करते हैं। |
| जीवन में ही रजिस्ट्रेशन जरूरी है | रजिस्ट्रेशन बेहतर है, पर मृत्यु के बाद भी परिजन की स्वीकृति से संभव है। |
| हर बीमारी में नेत्रदान हो सकता है | सिर्फ गंभीर संक्रामक बीमारियों में नेत्रदान नहीं किया जाता। |
समाज की ज़िम्मेदारी
हमें अपने घर और आसपास के लोगों को इस बारे में जागरूक करना चाहिए।
नेत्रदान के प्रति फैली गलत धारणाओं (मुँह बिगड़ जाएगा, आत्मा को कष्ट होगा आदि) को दूर करना ज़रूरी है।
धार्मिक व सामाजिक स्तर पर भी नेत्रदान को पुण्य का कार्य माना गया है।
निष्कर्ष
नेत्रदान एक ऐसा जीवनदायी उपहार है जिससे हम मरने के बाद भी किसी की ज़िन्दगी रोशन कर सकते हैं।
आइए, आज ही संकल्प लें –
👉 “मृत्यु के बाद मैं अपनी आँखें दान करूँगा।”
आपका यह छोटा-सा निर्णय किसी की दुनिया में उजाला बन सकता है।
भोपाल में किससे मिलें?
डॉ. सौरभ देशमुख
– नेत्र रोग विशेषज्ञ | रेटिना, मोतियाबिंद और न्यूरो-ऑप्थाल्मोलॉजी विशेषज्ञडॉ. कृति गुप्ता
– नेत्र रोग विशेषज्ञ | कॉर्निया, मोतियाबिंद, लेसिक और ड्राय आई स्पेशलिस्ट
